🌱 शुरुआती जीवन और शिक्षा
तमिलनाडु के तंजावुर जिले के गांव उमयालपुरम में 1968 में श्रीधर वेंम्बू का जन्म हुआ। शिक्षा, सादगी और मेहनत को उनके परिवार ने हमेशा प्राथमिकता दी।
उन्होंने ग्रेजुएशन की पढ़ाई IIT Madras से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के रूप में पूरी की। इसके बाद उन्होंने अमेरिका जाकर Princeton University से Phd व MS की डिग्री हासिल की।
इन शुरुआती अवसरों की सफलता के बावजूद — अमेरिका की खूबियां के बीच — उन्होंने सर्वथा एक अलग मार्ग चुना।
🔍 श्रीधर वेंम्बू: ग्रामीण भारत से जन्मी वैश्विक तकनीकी क्रांति
भारत देश की Digital दुनिया में कई नाम प्रसिद्ध हैं, लेकिन एक ऐसा नाम भी है जिसने सफलता की एक नई परिभाषा लिखी — श्रीधर वेंम्बू, Zoho Corporation के सह-संस्थापक और CEO। वे न केवल एक सफल उद्यमी मात्र हैं, बल्कि ऐसे दूरदर्शी व्यक्ति भी हैं जो ग्रामीण भारत को तकनीकी प्रतिभा का नया केंद्र बनाने में लगे हैं।
💡 “अमेरिका छोड़ वापस भारत” — एक साहसिक फैसला
सर्वप्रथम श्रीधर ने अमेरिका के बड़े संस्थानों में — Qualcomm में काम किया। लेकिन उन्होंने जल्द ही यह महसूस कर लिया था, कि उनकी सोच बड़े उद्देश्य के लिए है न कि किसी नौकरी तक सीमित है।
अपने साथियों और भाइयों के साथ मिलकर 1996 में उन्होंने एक छोटी सी कंपनी की शुरुआत की — जिसका नाम AdventNet रखा। बाद में 2009 में इसका नाम बदलकर Zoho Corporation कर दिया गया।
ज़ोहो कंपनी द्वारा SAAS (सॉफ्टवेयर-एज़-ए-सर्विस) मॉडल अपनाया गया — श्रीधर बंबू ने इस कंपनी को बाहरी निवेश (IPO या VC) से बचाकर रखते हुए इसको पूरी तरह आत्मनिर्भर रखा।
इस महत्वपूर्ण फैसले ने उनको टेक जगत में "बूटस्ट्रैप" यानी स्वनिर्भर सफलता की मिसाल बना दिया था।
🏡 जब महान बनने की चाह हुई — गाँव को मौका देने की ठानी
वेंम्बू ने 2019 में सिलिकॉन वैली जैसे बड़े टेक हब्स को छोड़कर वापस भारत लौटने और अपने काम को गांवों तक ले जाने का फैसला किया। श्रीधर ने तमिलनाडु के Mathalamparai गांव में बसाने का महत्वपूर्ण फैसला किया।
उनका मानना है कि — “प्रतिभा सार्वभौमिक है, अवसर नहीं।”
इसलिए वेंम्बू ने ज़ोहो के ऑफिस और प्रोडक्ट डेवलपमेंट यूनिट शहरों से बाहर, ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों में स्थापित किए।
इससे न केवल भारत की तकनीकी परंपराओं बल्कि — "मेरा गांव,मेरी पहचान" — को बल मिला। इस महत्वपूर्ण काम से ग्रामीण युवाओं को विश्व स्तरीय काम, सम्मान और अच्छी तनख्वाह मिली। यह कदम आर्थिक और सामाजिक क्रांति जैसा लग रहा था।
🎓 शिक्षा का नया रास्ता — पारंपरिक विश्वविद्यालय नहीं, व्यावहारिक हुनर
वेंम्बू ने 2004 में शुरू किया Zoho Schools Of Learning — ऐसा स्कूल जिसमें पारंपरिक कॉलेज डिग्री नहीं होती बल्कि उनमें हुनर होता था। जहां पर युवाओं को प्रशिक्षण मिलता है।
Zoho Schools ने यह साबित कर दिया है कि अच्छा इंजीनियर बनने के लिए एक डिग्री ही जरूरी नहीं है बल्कि — मेहनत, लगन, व्यावहारिक प्रशिक्षण और सही अवसर भी उतने ही ज्यादा मायने रखते हैं। कई इंजीनियर तो ऐसे हैं जिन्होंने कॉलेज डिग्री ना लेकर भी ज़ोहो में काम किया और कंपनी की सफलता में एक अहम योगदान दिया।
🌍 ग्लोबल सफलता, लेकिन देसी जड़ें — Zoho की कहानी
धीरे-धीरे Zoho ने एक ग्लोबल सॉफ्टवेयर कंपनी के रूप में अपनी पहचान बनाई : कहीं बड़े देशों में अपनी उपस्थिति ,हजारों कर्मचारी और छोटे बड़े व्यवसायों के लिए क्लाउड सॉल्यूशंस। लेकिन वेंम्बू ने "मेड इन इंडिया, मेड फॉर द वर्ल्ड" को क़ायम रखा।
श्रीधर ने कंपनी को कभी भी शेयर बाजार, बाहरी निवेश या IPO की ओर नहीं बढ़ने दिया — इससे Zoho की स्वतंत्रता बनी रही। वह अपने मूल सिद्धांतों — गांव के विकास, स्वावलंबन, भारतीय युवाओं को अवसर — से कभी भी समझौता नहीं किया।
🏅 सम्मान और सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
श्रीधर को भारत सरकार द्वारा 2021 में, "Padam Shri Award" से भी सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनको सामाजिक दृष्टिकोण व टेक्नोलॉजी में महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया गया था।
उनकी सोच : "टेक्नोलॉजी केवल मेट्रो और महानगरों तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए।" — आज उनकी यह सोच जो लाखों कर्मचारियों और ग्रामीण देशवासियों के लिए हकीकत सपना बन चुका है।
✨ क्यों श्रीधर वेंम्बू की कहानी है प्रेरक
- साहस और दूरदृष्टी — अपने कैरियर के शिखर पर रहकर भी उन्होंने अमेरिका - जैसी आलिसान जिंदगी को छोड़कर गांवों को चुना और हजारों लाखों युवाओं को सशक्त बनाने का एक हम रास्ता दिखाया।
- आत्मनिर्भरता व स्वावलंबन — उन्होंने बाहरी निवेश को दरकिनार करते हुए अपने विचार रचनात्मकता और मेहनत से कंपनी को एक उच्च शिखर पर ले गए।
- समाज के लिए काम — सिर्फ एक प्रॉफिट नहीं है, बल्कि भारत के युवाओं के लिए जिंदगी बदलने और गांव को एक नया आर्थिक चेहरा देने और शिक्षा को नया स्वरूप प्रदान करने में विश्वास रखा।
- देसी जड़ें और वैश्विक सोच — उन्होंने विश्व स्तरीय टेक्नोलॉजी बनाई लेकिन कभी भारतीय मिट्टी से जुड़े रहने की कसमें नहीं टूट पाई।
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